GDP in Hindi

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सकल घरेलु उत्पाद (जी डी पी) जी डी पी आमतौर पर बहुतायत में प्रयोग में आने वाला शब्द है सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत समूह इस शब्द को अलग अलग तरीकों से व्याख्या करते है किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी भी देश और उस समाज कि आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण सूचक जी डी पी है

यद्दपि यह मूलतः अर्थशास्त्रीय अवधारणा है किन्तु जैसा कि अर्थशास्त्र विषय प्रत्येक प्राणी को प्रभावित करता है इसलिए इसका महत्व और भी ज्यादा हो जाता है जब हम मानव विकास कि चर्चा करते है,वस्तुतः जी डी पी एक वर्ष के अन्दर किसी देश कि भौतिक सीमाओं के भीतर उस देश द्वारा जितना भी उत्पादन होता है और उससे जितना भी मूल्य प्राप्त होता है वह मूल्य उस देश का जी डी पी कहलाता है

तो जितना भी हम टैक्स जमा करते है वह सभी हमारी जी डी पी में सम्मिलित किया जाता है साथ ही हमारे देश में किसी विदेशी कंपनी द्वारा जो कर प्राप्त होता है वह भी हमारे देश की जी डी पी में ही शामिल होता है इसका अर्थ यह भी हुआ कि जितनी ज्यादा विदेशी कंपनी भारत में निवेश करेगी उतना भारत की जी डी पी बढ़ेगी साथ ही भारत के नागरिकों एवं यहाँ के लोगो की कंपनियों द्वारा जितना भी राजस्व प्राप्त होगा वह भी भारत की जी डी पी में ही संकलित होगा

भारत विश्व की सातवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है एक अनुमान के अनुसार यह 2019 तक फ्रांस को पीछे छोड़कर कर विश्व कि पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी वर्तमान में भारत कि जी डी पी 2.43 ट्रिलियन अमेरिकन डॉलर है हालाकि तथ्यों पर नज़र डाले तो कुछ और ही परिद्रश्य सामने आता है भारत विश्व के दुसरे नंबर की जनसँख्या वाला देश है जहा विश्व कि 17.5% जनसँख्या निवास करती है परन्तु विश्व के कूल जी डी पी में भारत का योगदान केवल 7.32 % ही है और हमसे आगे संयुक्त राज्य अमेरिका,चीन,जापान,जर्मनी और इंग्लैंड जैसे देश है जिसमे चीन को छोड़ दे तो जनसँख्या के अनुसार हम पहली कगार पर है और इंग्लैंड,फ्रांस,जर्मनी और फ्रांस से तो हमारा भोगोलिक क्षेत्रफल भी ज्यादा है

भारत के जी डी पी का कम होना भारतीय अर्थव्यवस्था के पीछे होने का संकेत तो है ही यह परिद्रश्य विश्व में आर्थिक विषमता को भी दर्शा रहा है अब जब हमारी अर्थव्यवस्था 6 से 7 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रही है संभव है कि हमारा देश आर्थिक क्षेत्र में भी सिरमोर बन जाए किन्तु समाज कार्य के विद्यार्थियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम इस आर्थिक प्रगति को ही विकास का आधार न मान ले और सामाजिक क्षेत्र में भी यह आर्थिक प्रगति नज़र आए जो अभी भी बहुत दूर का लक्ष्य दिखती है

प्रसिद्द अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन कि वेलफेयर इकोनॉमिक्स कि अवधारणा का ज़िक्र करना यहाँ आवश्यक है जो यह कहती है की अर्थशास्त्र कि प्रगति का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुचना अनिवार्य है और जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवार को देश की आर्थिक उन्नति का लाभ नहीं मिलता तब तक आर्थिक प्रगति केवल एक अच्छा आंकड़ा मात्र है यह तथ्य जग जाहिर है कि चीन ने पहले अपनी डोमेस्टिक इकॉनमी को मजबूत किया,देश में लघु-कुटीर उद्योग को बढ़ावा दिया फिर ही वह विश्व पटल पर मजबूत बन पाया

जी डी पी कहीं भ्रम तो नहीं ?

हम सभी जानते है कि सांख्यिकी एक ऐसा विषय है जो कुछ भी साबित कर सकता है कई बार सांख्यिकी द्वारा प्रतिपादित समंक हमें भ्रम में भी रख सकते है और जी डी पी के साथ भी ऐसा संभव है वस्तुतः जब हम भारत के जी डी पी कि बात करते है तो यह इसमें भारत का प्रत्येक व्यक्ति सम्मिलित होता है अर्थात इस देश में रहने वाले सबसे अमीर व्यक्ति से लेकर सबसे गरीब व्यक्ति तक अर्थात कोई बड़ा औद्योगिक घराना आर्थिक प्रगति करेगा तो एक बड़ा आर्थिक स्थान्तरण देश कीजी डी पी में होगा जो देश के हर नागरिक पर लागू होगा चाहे वह व्यावहारिक रूप से उसमे शामिल हो या ना हो, इसीलिए केवल जी डी पी को जानना पपर्याप्त नहीं है हमें इससे आगे पी पी पी अर्थात पर्चेसिंग पॉवर पैरिटी या क्रय शक्ति समता को भी जानना अनिवार्य है

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